रूस यूक्रेन युद्धः छह दिन बाद दिल्ली पहुंची भीलवाड़ा की हिमांशी: सर जमीं पर कदम रखते ही बेटी मुस्काई, गले मिलते ही भावुक हो उठे पापा
भीलवाड़ा (राजस्थान/ बृजेश शर्मा) रूस द्वारा यूक्रे न पर हमले के छह दिन तक हर पल खौफ के साए में रही लाड़ली बेटी जब आज सुबह आठ बजे अपनी सरजमीं पर पहुंची तो पिता ने लाड़ली बेटी को गलगकर अपने आंसू नहीं रोक पाई। दोनों को बेटी के मामा ने ढांढ़स बंधाकर शांत कराया। यह भावुक पल था नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर। यूक्रेन के टर्नीपिल में युद्ध के हालात के बाद वहां फंसी भीलवाड़ा की लाड़ली बेटी हिमांशी शर्मा सुबह हंगरी के रास्ते आज सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची।ले से लगा लिया। वे रो पड़े तो बेटी भी पिता से गले लगकर अपने आंसू नहीं रोक पाई। दोनों को बेटी के मामा ने ढांढ़स बंधाकर शांत कराया। यह भावुक पल था नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर। यूक्रेन के टर्नीपिल में युद्ध के हालात के बाद वहां फंसी भीलवाड़ा की लाड़ली बेटी हिमांशी शर्मा सुबह हंगरी के रास्ते आज सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंची। केंद्र सरकार के प्रयासों से हिमांशी सहित अनेक छात्रों को एयरलिफ्ट कर लाया गया। हिमांशी टर्नीपिल में एमबीबीएस कर रही है। उसका पांचवां साल है। हिमांशी के हिंदुस्तान की सरजमीं पर कदम रखते ही खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मानो उसकी जान में जान आई हो। आजाद नगर सी सेक्टर निवासी हिमांशी ने एयरपोर्ट पर जैसे ही अपने पिता प्रभूलाल भूङ व मामा को देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। पिता ने भी बेटी को गले लगा लिया और भावकु हो गए। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। बेटी भी पिता से लिपटकर रोने लगी। ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि खुशी के थे। आखिर छह दिन बाद जो बेटी के स्वदेश लौटने की खुशी मिली। पिता प्रभूलाल ने बताया कि जब फ्लाइट बच्चों को लेकर एयरपोर्ट पहुंची तो वहां भारतीय ध्वज लहराने लगा। भारत माता की जय के जयकारे गूंज उठे। अपने बच्चों से मिलकर परिजन खुद के आंसू नहीं रोक पा रहे थे। सारा माहौल भावुक था। पापा प्रभूलाल ने कहा- अब हमारी जान में जान आई है। कई दिन से बेटी सो भी नहीं पाई थी। डर के साए में नींद कहां आती? वे बेटी के लिए परांठे, भिंडी की सब्जी, चटनी, नमकीन व पापड़ साथ ले आए। उसने कार में बैठने के बाद खाना खाया। उसे थकान की वजह से तुरंत ही नींद आ गई। वे शाम तक भीलवाड़ा पहुंचेंगे।
- बहुत ही मुश्किल दौर से लौटी अपने घर
हिमांशी टर्नीपोल से पौलेंड बॉर्डर, उजरोद (पश्चिमी यूक्रे न), फिर वहां से बस से हंगरी बॉर्डर पहुंची। हंगरी की राजधानी बूड़ापेस्ट हवाई अड्डे से कल रात 11:15 बजे फ्लाइट से रवाना हुई हिमांशी ने कहा कि हंगरी बॉर्डर पर अच्छी व्यवस्था की थी। पर इससे पहले के जो दिन बीते वो बहुत ही मुश्किल रहे। युद्ध शुरू होते ही फ्लेट खाली कर बंकर में छिपना पड़ा। फिर भारतीय दूतावास के मैसेज पर यूक्रेन से भारत के लिए निकलने को भटकते रहे। कई रातें सो भी नहीं पाए। ये हालात भी बने कि पानी खाने को भी तरस गए।